श्री हनुमान चालीसा | Hanuman Chalisa in Hindi

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About Lord Hanuman

One day after their birth, their mother left her in the ashram to bring fruit. When the baby Hanuman was hungry, he began to fly in the sky holding the rising sun as fruit and catching it.

To help him, the wind also ran very fast. On the other hand, Lord Sun allowed them to not burn with their sharpness as a disguised child. At the time when Hanuman sat down to catch the sun, at that time Rahu wanted to eclipse on the sun.

When Hanumanji touched Rahu in the upper part of the sun, he got frightened and fled from there. He complained to Indra and complained “Devraj!” You gave me sun and moon as a means of restoring my appetites.

Today, on the new moon day, when I went to suffer the sun, I saw that the other Rahu is going to catch the sun.

Upon listening to Rahu, Indra got scared and took her along and walked towards the sun. Seeing Rahu, Hanuman jumped on the sun but left the sun When Rahu called Indra for protection.

Hanuman chalisa

हनुमान जी अंजली मां के पुत्र हैं इन्हें पवन पुत्र हनुमान जी के नाम से भी जाना जाता है  हनुमान जी काफी बलवान और बुद्धिमान है इन्होंने भगवान सूर्य से शिक्षा ग्रहण की थी

लेकिन हनुमान जी श्री रामचंद्र जी के भक्त थे और उन्होंने श्री राम की सभी समस्याओं को हल करने में उनकी सहायता की उन्होंने ही सीता मां की खोज की थी कि वह लंका में रावण ने कैद कर लिया है

उन्होंने ही लंका की खोज की थी उन्होंने सुग्रीव का साथ कभी नहीं छोड़ा वह एक परम भक्त होने के साथ-साथ परम मित्र भी थे उन्होंने कभी भी किसी भी औरत की तरफ आंख उठाकर के भी नहीं देखा उन्होंने कभी शादी नहीं की क्योंकि वह एक बाल ब्रह्मचारी थे

Hanuman Chalisa in hindi

  1. ।दोहा।।
  2. श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार |
    बरनौ रघुवर बिमल जसु , जो दायक फल चारि |
  3. बुद्धिहीन तनु जानि के , सुमिरौ पवन कुमार |
    बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार ||
  4. ।।चौपाई।।
  5. जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिंहु लोक उजागर |
    रामदूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवन सुत नामा ||2||
  6. महाबीर बिक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी |
    कंचन बरन बिराज सुबेसा, कान्हन कुण्डल कुंचित केसा ||4|
  7. हाथ ब्रज औ ध्वजा विराजे कान्धे मूंज जनेऊ साजे |
    शंकर सुवन केसरी नन्दन तेज प्रताप महा जग बन्दन ||6|
  8. विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर |
    प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया रामलखन सीता मन बसिया ||8||
  9. सूक्ष्म रूप धरि सियंहि दिखावा बिकट रूप धरि लंक जरावा |
    भीम रूप धरि असुर संहारे रामचन्द्र के काज सवारे ||10||
  10. लाये सजीवन लखन जियाये श्री रघुबीर हरषि उर लाये |
    रघुपति कीन्हि बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरत सम भाई ||12||
  11. सहस बदन तुम्हरो जस गावें अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावें |
    सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा ||14||
  12. जम कुबेर दिगपाल कहाँ ते कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते |
    तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा राम मिलाय राज पद दीन्हा ||16||
  13. तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना लंकेश्वर भये सब जग जाना |
    जुग सहस्र जोजन पर भानु लील्यो ताहि मधुर फल जानु ||18|
  14. प्रभु मुद्रिका मेलि मुख मांहि जलधि लाँघ गये अचरज नाहिं |
    दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||20||
  15. राम दुवारे तुम रखवारे होत न आज्ञा बिनु पैसारे |
    सब सुख लहे तुम्हारी सरना तुम रक्षक काहें को डरना ||22||
  16. आपन तेज सम्हारो आपे तीनों लोक हाँक ते काँपे |
    भूत पिशाच निकट नहीं आवें महाबीर जब नाम सुनावें ||24||
  17. नासे रोग हरे सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा |
    संकट ते हनुमान छुड़ावें मन क्रम बचन ध्यान जो लावें ||26||
  18. सब पर राम तपस्वी राजा तिनके काज सकल तुम साजा |
    और मनोरथ जो कोई लावे सोई अमित जीवन फल पावे ||28||
  19. चारों जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा |
    साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे ||30||
  20. अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता
    राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा ||32||
  21. तुम्हरे भजन राम को पावें जनम जनम के दुख बिसरावें |
    अन्त काल रघुबर पुर जाई जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ||34||
  22. और देवता चित्त न धरई हनुमत सेई सर्व सुख करई |
    संकट कटे मिटे सब पीरा जपत निरन्तर हनुमत बलबीरा ||36||
  23. जय जय जय हनुमान गोसाईं कृपा करो गुरुदेव की नाईं |
    जो सत बार पाठ कर कोई छूटई बन्दि महासुख होई ||38||
  24. जो यह पाठ पढे हनुमान चालीसा होय सिद्धि साखी गौरीसा |
    तुलसीदास सदा हरि चेरा कीजै नाथ हृदय मँह डेरा ||40||
  25. ।।दोहा।।
    पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप |
    राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ||

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